
रेबीज़ दुनिया की सबसे घातक ज़ूनोटिक (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली) बीमारियों में से एक है, जिससे हर साल लगभग 60 हज़ार लोगों की जान चली जाती है. इनमें से एक-तिहाई मौतें भारत में होती हैं. विडम्बना यह है कि इनमें से अधिकाँश मौतें, समय पर सही जानकारी और इलाज मिल जाने पर आसानी से टाली जा सकती थीं. ऐसे में एक फ़ोन नम्बर - 15400, हैल्पलाइन के रूप में उम्मीद की किरण बनकर उभरा है. मध्य प्रदेश के सुनील कुमार यादव को एक आवारा कुत्ते ने काट लिया. घबराए सुनील अपने एक मित्र के पास पहुँचे, जिन्होंने निजी क्लीनिक से उन्हें एक टीका लगवाया. लेकिन कुछ ही देर बाद सुनील ने देखा कि वैक्सीन की शीशी पर लिखा था: "केवल पशुओं के उपयोग हेतु."उन्होंने चौंककर तुरन्त 15400 नम्बर पर कॉल किया. हैल्पलाइन ऑपरेटर ने सही जानकारी देते हुए, उन्हें तुरन्त नज़दीकी सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र भेजा, जहाँ मानव उपयोग के लिए सही रेबीज़ वैक्सीन उपलब्ध थी. समय पर इलाज मिलने से उनकी जान बच गई.जानकारी का अभावभारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक सर्वेक्षम में पाया गया है कि रेबीज़ से जुड़ी अधिकाँश मौतें, जानकारी की कमी, अधूरे टीकाकरण और पारम्परिक उपचार पर निर्भरता के कारण होती हैं. जिन लोगों को सम्भावित संक्रमित जानवरों ने काटा होता है, उनमें से लगभग आधे लोगों का पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ होता है - जोकि अत्यन्त घातक है, क्योंकि एक बार लक्षण उभरने पर रेबीज़ बीमारी, 100% जानलेवा हो जाती है.रेबीज़ फैलाने वाले पशुओं द्वारा काटे जाने के बाद की स्थिति में टीकाकरण के लिए 5 ख़ुराकें अनिवार्य हैं: दिन 0, 3, 7, 14 और 28. यदि पहले से टीकाकरण कराया गया हो तो केवल दो ख़ुराक पर्याप्त होती हैं (दिन 0 और 3).15400: राष्ट्रीय स्तर पर एक जीवनरक्षक पहलयह हैल्पलाइन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र (NCDC) से संचालित है, और इसे UNDP का तकनीकी सहयोग दिया गया है. Access Delivery Partnership (ADP) के सहयोग से शुरु हुई यह सेवा, इस समय दिल्ली, असम, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पुदुचेरी में उपलब्ध है. इस योजना का लक्ष्य, कुत्तों से फैलने वाली रेबीज़ बीमारी को, 2030 तक समाप्त करना है.हैल्पलाइन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र की संयुक्त निदेशक और Centre for One Health की प्रमुख डॉक्टर सिम्मी तिवारी कहती हैं, “रेबीज़ से होने वाली मौतों में गिरावट दरअसल, सरकारों और साझीदार संगठनों के संयुक्त प्रयासों का नतीजा है. लेकिन 2030 का लक्ष्य पाने के लिए हमें ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण को और मज़बूती से अपनाना होगा.”‘वन हैल्थ’ दृष्टिकोण: ज़ूनोटिक बीमारियों से बचाव का रास्ता‘वन हैल्थ’ यानि मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एकीकृत रूप से देखना. अध्ययन बताते हैं कि 75% ज़ूनोटिक संक्रमण समय पर जागरूकता और टीकाकरण से रोके जा सकते हैं.सुनील की कहानी भले ही सौभाग्यपूर्ण रही, लेकिन यह हमें याद दिलाती है - सही जानकारी, समय पर इलाज और एक कॉल - जीवन और मृत्यु के बीच का अन्तर तय कर सकते हैं.यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.