चंडीगढ़। हरियाणा में 26 और 27 जुलाई को कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) है — हज़ारों युवा उम्मीदवार तैयारी में लगे हुए हैं। लेकिन इस बार समस्या सिर्फ सवालों के जवाबों की नहीं है, बल्कि परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की भी है। और ये समस्या सिर्फ उम्मीदवारों की नहीं, बल्कि हर उस आम आदमी की भी है, जो हरियाणा रोडवेज की बसों से रोज़मर्रा का सफर करता है — चाहे वो ऑफिस जाने वाला कर्मचारी हो, दवा लेने निकला बुज़ुर्ग, या रोज़ कमाकर खाने वाला मजदूर।
क्या है मामला?
कुछ युवाओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है कि "हमने CET के लिए फॉर्म भरा, दस्तावेज दिए, फीस भरी — लेकिन अब तक एडमिट कार्ड नहीं मिला।"और दूसरी तरफ एक और याचिका कहती है "सरकार ने रोडवेज की ज़्यादातर बसें परीक्षा ड्यूटी में भेज दी हैं — अब आम लोग जाएंगे तो जाएंगे कैसे?"
हाईकोर्ट में फिर सुनवाई
बुधवार को समय की कमी के कारण सुनवाई नहीं हो पाई थी, लेकिन आज फिर से ये मामला कोर्ट में उठेगा। एक तरफ युवा चाहते हैं कि उन्हें एडमिट कार्ड मिलें और परीक्षा में बैठने का मौका मिले, दूसरी तरफ यात्री चाहते हैं कि बसें बंद न हों, परिवहन वैकल्पिक इंतज़ाम हों।
सरकार की सफाई क्या है?
सरकार ने याचिकाओं को "आधारहीन" बताया है। उनका कहना है कि परीक्षा ज़रूरी है, और कुछ समय की असुविधा को समझा जाना चाहिए। मगर सवाल यह है कि क्या इस असुविधा की पहले से तैयारी नहीं होनी चाहिए थी?
"परीक्षा के दिन, सफर भी एक टेस्ट बन गया है"
• बुज़ुर्गों के लिए दवा तक पहुंचना मुश्किल होगा• मज़दूर वर्ग को दिहाड़ी पर पहुँचना भारी• रोज़ ऑफिस जाने वालों को परेशानी• और जो बच्चे CET में बैठने को बेताब हैं — उन्हें भी बस तक पहुंचना किसी एग्ज़ाम से कम नहीं!
क्या हल निकल सकता है?
• क्या सरकार कुछ बसें आम यात्रियों के लिए आरक्षित नहीं कर सकती थी?• क्या एक वैकल्पिक ट्रांज़िट प्लान नहीं बनना चाहिए था?• और जिन युवाओं के एडमिट कार्ड अब तक नहीं आए — उनकी मेहनत का क्या?
पेपर से पहले प्लानिंग की हार
हरियाणा CET केवल एक परीक्षा नहीं रह गई — ये प्रणाली, तैयारी और प्राथमिकता की भी परीक्षा बन गई है। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट पर हैं — क्योंकि फैसला सिर्फ कागज़ पर नहीं होगा, हज़ारों ज़िंदगियों को प्रभावित करेगा।“